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एक विश्वास जो छला गया

एक विश्वास के साथ रोज खोलता हूं अखबार कि कोई तो होगी खबर जब लगने लगेगा हमको, तुमको और उनको कि नींद से जाग गए हैं रहबर। हर बार टूट जाता है मेरा अदना सा विश्वास हर बार खाता हूं धोखा सुबह-सुबह चिढ़ाती हैं अखबार में तनी लाल-पीली रेखा। आज फिर, आठ मरे दस घायल हैं महिला बच्चों सहित कुएं में गिरी और अब पागल है। देश की आधी रकम खा गए कुछ चालाक भेडिए आग लग जाएगी देश में इन्हें मत छेड़िए। धान की फसल घर में और किसान नंगा है कौन कहे शासन से यह तो विकट पंगा है। जानते हुए भी यह सब कि कल कुछ नहीं बदलेगा हर रोज खोलता हूं पन्ने टटोलता हूं ढूंढ हाथों से आखिर कहीं तो छुपी होगी वह छोटी सी चिंगारी।।
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By yogesh jadon 12:38 | 15/Jun/2008 | 3 Comment(s) |
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काश तुम्हें जी भर के

काश तुम्हें जी भर के प्यार न कर पाता। आरजुओं के अंगारों का संताप न सह पाता।। हमने राख कुरेदी जब-जब ढेरों कुंदन पाया चंदन में लिपटे सांपों ने इसीलिए डस खाया।। अपनी ही पीड़ा का खुद ही उपचार न कर पाता काश तुम्हें जी भर के प्यार न कर पाता।।
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औरत के नाम

सच कहूंगी तो हार जाऊंगी क्योंकि मैं औरत हूं। जुल्म,बेबसी की अकथ शोहरत हूं क्योंकि मैं औरत हूं। लपलपाती निगाहों से निकली जो बच घर की चौखत पर दामन स्वाहा हो गया। चीख पहुंची न उनके कानों तलक कैसे नाते,बस कागज पर छपी दौलत हूं, क्योंकि मैं औरत हूं।जिस्म हूं, जान हूं, महफिल मैं अधर्य पान हूं बस जिंदा इसी एक बदौलत हूं क्योंकि मैं औरत हूं। बनाकर मुझको संगमरमर खुश है जमाना इस अदा पर रौंदते हैं मेरी छाती, पेट तालू फिर भी चुप जिंदा एक मूरत हूं क्योंकि मैं औरत हूं।
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एक पेड़ था हमारे घर
प्रिय दोस्तो, मेरे पिता का निधन हो जाने से बहुत दिन तक आपके साथ नहीं रह सका इसके लिए क्या कहूं। अब मैं फिर आपके साथ हूं। पिता की याद में यह कविता....
एक पेड़ था हमारे घर में, विशाल, उन्मुक्त और उत्साही ताजी हवा का एक झौंका और वह झूम उठता था अपने पूरे यौवन के साथ उसकी ताजी हंसी जीवन देती थी हमारी शिराओं और धमनियों को उसकी डाल-डाल पर दौड़ते-भागते हम न जाने कब बड़े हो गए इतने बड़े कि उसका कद छोटा पड़ने लगा फिर एक दिन उसने समेट लिया खुद को उसका उत्साह उसकी हंसी खो सी गई कहीं हम समझ ही नहीं सके उसके मौन की भाषा उस मौन में भी हमे वह अपना सा लगता यह अपना न जाने कब थम गया फिर एक दिन समेट ली उसने अपनी छाया भी आज वह पेड़ नहीं रहा नहीं रहे उसके बोल उसकी अबोल भाषा आज हमें बोल देती है।
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By yogesh jadon 01:24 | 11/May/2008 | 1 Comment(s) |
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मायावती का सोशल फार्मूला

अहम् बरअहम् अम्बेडकर मध्यप्रदेश के ब्राह्मणों मैं एन दिनों अजीब अकुलाहट है। ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकर बड़ी साबित करने की होड़। अकेला ब्रह्मण ही क्यों पुरा सवर्ण वर्ग ही एस दोड मैं सामिल है, ब्रह्मण कुछ ज्यादा। उप मैं जब से मायावती का सोशल फार्मूला हित हुआ है , तमाम प्रदेशों का भाईचारा राजनितिक गदिंत के एस अब्सर को लपक लेने की फिराक मैं है। मप इससे अछुता नही है। मप के कस्बों की दिबरे एन दिनों माया और उनके भाईचारा गन मैं रंगी हुई हैं ।मायावती को सामाजिक सद्भाव का देवदूत बताते यह संदेश स्वरण वर्ग को सत्ता के गलियारे तक पहुँचने के लिए सुनहरे रस्ते नजर आ रहा है। जातिवादी सम्मेलन मैं भीड़ का उन्माद to देखते ही बनता है । पंडितों के बीच रातों रात नए नेता प्रगट हो गए । यह वो लोग थे जो कभी अपने कसबे और शहर मैं छोटी-मोटी राजनीत किया करते हैं । इनके पास पैसे की ताकत है और मायावती उन्हें एक अब्सर दिखाती दे रही है । इन लोगों के बीच आज एक बात नारे की तरह प्रचलित हो रही है । अहम् ब्रह्म अम्बेडकर । सबसे बडा अम्बेडकरवादी होने का दिखावा । सबसे बडा दलित होने की खव्हिश । इनमें से बहुत कम को ही अम्बेडकर और उनके सिधान्तो से कोई लेना देना हो। बहुतेरे तो इस सबसे वास्ता ही नही रखते। उनके लिए अम्बेडकर होने का मतलब है दलितों के साथ उठाना बैठना और उनके हितैषी होने का ढोंग करना। उनके लिए दलित एक वोट बैंक है जो जातीयता के इस उन्मादी युग मैं उनकी जात के सत्ता तक पहुँचने की उनकी क्वाहिश को पूरा कर सकता है। मध्यप्रदेश के जातिगत आंकडो की बात करें तो यहाँ ब्रह्मण के सिथति यूपी से अलग है। प्रदेश की ३०० से अधिक विधानसभा मैं ३० फीसदी भी एसी नही हैं जहाँ ब्रह्मण अकेले अपने दम पर कोई सीट जीता सके। प्रदेश के उत्तर-पछिम इलाके मैं अनुसूचित और पिछड़ा वर्ग की संख्या अधिक है । बसपा इस इलाके मैं अपनी उपस्थिति दर्ग करती आ रही है। उसकी असली पहचान तो जनजातीय छेत्र मैं होनी है । यहाँ अभी तक जनजातीय वर्ग का कांग्रेस से मोह नही टुटा है । इस इलाके मैं ब्रह्मण एस हालत मैं नही है की वः माया के वोट बैंक से मिलकर उसे सत्ता तक पहुँचा सके । इसे मैं मध्यप्रदेश मैं माया अकेले ब्राह्मणों के बूते नही रह सकती हैं । सम्भव है की वः अपना प्रतिनिधि इलाके के बहुसंख्यक वर्ग से ही चुने । यह ब्रह्मण , ठाकुर ,बनिया या फिर कोई भी हो सकता है । यूपी मैं उनहोने इस फार्मूले को अपनाने का मन तभी बना लिया था जब भाजपा ने दूसरी बार उनकी सरकार गिराई थी । माया और उनके साथियों ने तभी सीधे जनता के बीच जाकर गठबंधन करने की बात कही थी। इस अब्सर को वहाँ ब्राह्मणों ने पहले पकड़ा । यूपी के ब्राह्मणों का मध्य प्रदेश मैं सम्बन्ध हैं । रोटी बेटी के सम्बन्ध। सत्ता के इस खेल मैं इन संबंधों के जरिये भी अवसर लपकने की कवायद चल रही है इस मामले मैं मध्यप्रदेश के सामाजिक कार्यकर्त्ता और राजनीत मैं दखल रखने वाले मेरे एक मित्र की टिप्पणी मायने रखती है। जब इस से मायावती के इस जादू के बारे मैं पूछा टू उसका कहना था की प्रदेश मैं इन दिनों सभी पंडितो मी ख़ुद को सबसे बड़ा दलित साबित करने की होड़ लगी हुई है । जब की मेरे मित्र का कहना था की मायाबती की पार्टी को मप मैं यूपी सी सफलता नही मिलने वाली है । वह इसके कारण भी गिनता है । पहला तो यह की यूपी का ब्रह्मण ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा था । उसे न तो बीजेपी मैं जमीन दिख रही थी और न ही यादवों के बीच सम्मान । उन्हें ये सम्मान दलितों मैं दिखाई दिया । मप के ब्राह्मणों के सामने इस तरह के हालत नही हैं । यहाँ जातीय उन्माद की हालत भी वैसी नही है। तीसरे प्रदेश का वोटर अभी दो पार्टियों से इतर विकल्प की तलाश मैं नही है । मायावती के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भले ही उन्हें मप की सत्ता न दिला पाई लेकिन इतना तय है की उसने इस प्रदेश की उच्च जाती के मुंच और पूँछ के बल खोल दिए हैं । जातिवाद के उन्मादी अब बेशर्म तरीके से ही ख़ुद को बडा कह सकते हैं । माया के जातिवादी राजनेतिक घोल ने वो कर दिखाया है जो कभी अम्बेडकर और बुध नही कर सके । सत्ता की सस्ती डगर पर चलने को आतुर सवर्ण जाती के दिग्गजों के बीच आज ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकरवादी साबित करने की होड़ लगी हुई है । यह सामाजिक बदलाव है । कल तक जिसे अचुत मन आज उसकी बराबरी करने की आतुरता। यह सत्ता का जादू हो सकता है लेकिन इस जादू ने जातीय दर्प की सच्चाई की पोल तो खोल ही दी है।
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By yogesh jadon 13:12 | 10/May/2008 | 2 Comment(s) |
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एक विनम्र पड़ताल

मुझे इस बात से, कुछ नहीं लेना कि आप दिखने में कैसे हैं जवान हैं या बूढ़े। मुझे इससे भी कोई मतलब नहीं कि, आपके घर बिछे कालीन का रंग कैसा है। आपके शयनकभ से झांकती चादर कितनी मैली हो गई है। मुझे इससे भी कोई सरोकार नहीं कि, आपके कीमती पैन में, भरी स्याही की, कीमत किसने चुकाई है। आप क्या पढ़ते हैं, कितना पढ़ते हैं, इससे भी मेरा खास संबंध नहीं है। मुझे पूछना है अब अपनी लेखनी से जिंदगी पर छाए कुहासे को क्या वह छांट सकती है दूर तक फैले तीरगी को चीरने का हौसला है। मैं जांचना चाहता हूं उन हाथों को, थाम रखी हैं जिनमें कलम शिराओं में बहते लहू में अब कितनी तपिश है।
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By yogesh jadon 12:20 | 10/May/2008 | 1 Comment(s) |
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हर बार हारा हूं मैं

बार-बार जी करता है कि लिख ही दूं सब कुछ सच-सच कि अंतडियां कंपकंपा देने वाली ठंड में सीलन भरी कोठरी के तमाम कोनों में सोने का कानून तलशता मैं सुबह को तपासता हूं उंगलियों से और पोरों से टकराता है उदास और भुरकुस अंधेरा। ढूंढता है बदन परिचित झुरझुरी में तुम्हें और तुम पड़ोस की फुसफुसाहटी गरमी में खो जाती हो जैसे चली जाती है सरदी में ढांढस देती बिजली। कितनी बार चाहा कि जान ही लो तुम पेट-औ-पीठ को जोड़ती नौकरी दम तोड़ देती है हर शाम हुक्मरानों के जूतों तले दबकर। आखिर किसको पुकारू यहां, सब सोए हैं निरे अंधेरे में हाथ-पैर पटकते, अपने आप में ही मुग्ध। थके बदन चुचआते पसीने के बीच जब भी बैठता हूं थोपने रोटियां तब सोचता हूं कल लिख ही दूंगा। हर बार बदल जाता है मन कि कही यह सब पढ़कर तुम्हारा संकुचन स्थायी न हो जाए। और तपेदिक हालात पढ़कर तुममे विगलन न हो जाए क्योंकि वह दीया जहां से जरुरी ऊष्मा आ रही है वह तुम्हीं में तो जल रहा है।
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संपत पाल

हमारे देश के कम्यूनिस्टों को उत्तरप्रदेश के बांदा जनपद के गांव नरैनी की संपत पाल से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। जरूरत है काम के स्तर पर उन्हें समझने और संगठन के स्तर पर उनकी दिशा को जानने की। संपत पाल बीत दो साल में इस क्षेत्र में एक ऐसा नाम बनकर उभरा है जो समर्थक है वंचितों की जो विश्वास हैं उनका जिन्हें समाज से दुत्कार के अलावा कुछ नहीं मिला। संपत पाल ने देखते ही देखते अपने पीछे दस हजार से भी अधिक ऐसी महिलाओं की फौज खड़ी कर ली है जो एक आवाज पर अपनी जान तक दे सकती हैं। संपत की इस ताकत का ही फल है कि आज प्रदेश सरकार के आका उन्हें नक्सली साबित कराने की बैसिर पैर की कोशिशों में लगे हुए हैं। संपत पाल से जो एक चीज सीखने की जरूरत है वह है संगठन खड़ा करने की उनकी ताकत। संपत के विचार न केवल दलित समर्थक हैं बल्कि उनका रूप रंग और बात करने का ढंग उन्हें दलितों के साथ खड़ा करता है। यही एक खूबी है कि संपत आज बांदा इलाके के दलितों के सर्वाधिक करीब हैं। मुझे याद है वह समय जब मैं कानपुर मैं तैनात था। हमारे साथी बांदा से संपत पाल की गतिविधियों की खबर देते रहते थे। तब संपत और उनके साथी राशन वितरण प्रणाली में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ जूझ रहा था। इन दो सालों में संपत की ताकत कहां से कहां पहुंच गई है। सांप्रदायिकता से लड़ने के बेवकूफी भरे तर्क और कथनी करनी में अंतर रखने वाले देश के कम्यूनिस्टों को संपत से दीक्षा लेने की जरूरत है। दीक्षा इस बात की कि वह जाने की वंचितों के बीच विश्वास कैसे हासिल किया जाता है। दलित और पिछड़ों को अनपढ़ कहकर उनके दिमाग में सही बात नहीं आती यह तर्क देने वालों को संपत के सानिध्य में कम से कम दो दिन गुजारने की जरुरत है। पीड़ा की भाषा और उसके कारक को भला कौन नहीं जानता है। जानवर भी अपने दुश्मन और दोस्त की पहचान जानता है फिर भला दलितों को यह समझ क्यों नहीं हो सकती। कम्यूनिस्टों जो देश में पिछले सौ साल से अपनी गतिविधियों को संचालित कर रहे हैं उन्हें बंगाल को छोड़कर कहीं बड़ी स्वीकार्यता नहीं मिली है। इसके पीछे वे न समझ आने वाले कारण भी गिनाते हैं। तर्क यह कि उनकी सही बातें देश के लोगों को समझने में देर लगेगी कि सांप्रदायिकता के जहर ने लोगों की बुद्धि पर पर्दा डाल दिया है आदि, आदि। इन लोगों को यह समझना चाहिए कि जो संपत के साथ खड़े है वह बहुत बड़े बुद्धिजीवी नहीं हैं और न ही वह लोग नास्तिक हैं फिर उन्हें शोषण की भाषा और उसके विरोध की केमेस्ट्री अच्छी तरह आती है। वह जानते हैं कि संपत की नीयत बेहद साफ है। भले ही उत्तरप्रदेश की पुलिस को वह कुछ भी लगे। वैसे संपत के साथ प्रदेश की पुलिस कुछ वैसा ही कर रही है जो कभी अमेरिकी सरकार ने ओशो के साथ किया है। जो आप के साथ नहीं खड़ा है उसे मिटा दो।
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By yogesh jadon 01:05 | 30/Apr/2008 | 0 Comment(s) |
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कुछ शहरों का किक्रेट
 आपीएल का तमाशा कुछ शहरों का किक्रेट बनकर रह गया है। दरअसल इस खेल में अब पहले का जुनून नहीं पा रहा है। हमारे देश में किक्रेट हमेशा से ही भावना का खेल रहा है। खुद को बेहतर करने की भावना। ऐसे में जब वह किक्रेट के करीब होता है तो खुद को एक हिंदुस्तानी के रुप में ही देखता है। उसकी इच्छा पूरे विश्व पर छाने की होती है। इसे आप दमित भावनाओं की प्रतिक्रिया भी कह सकते हैं। मगर वह जो जुनून पाकिस्तान या किसी अन्य देश के साथ अपने देश टीम के साथ होने वाले मैचों में पाता है वह आईपीएल में नहीं है। आइपीएल के काले गोरों से भरी टीम में वह खुद को किससे जोड़े यही तय नहीं कर पाता है। ऐसे में यह खेल उन शहरों तक ही सिमट गया है जहां कि टीम इस मैच में भाग ले रही हैं। कई की हालत तो यह है कि उन्हें पता ही नहीं कि कौन खिलाड़ी किसके साथ है। फिर गोरों की कलाई मरोड़ते या फिर पाकिस्तान की हिप-हिप हुर्रे वह कहां से ढूंढे। उसके लिए तो खिलाड़ी मैदान में खेलता योद्धा है। अब गोरों और कालों की विविधता की इस टीम में वह अपना योद्धा कहां से खोजे।
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By yogesh jadon 14:38 | 25/Apr/2008 | 0 Comment(s) |
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महासंग्राम में

यह कविता महाभारत के एक पात्र विकर्ण पर लिखी है। महाभारत में अद्भूत पात्र है विकर्ण। एक ऐसा पात्र जो नायकों की भीड़ में खो सा गया। व्यास भी इस पात्र के साथ न्याय से करते नहीं दिखते। जबकि विकर्ण ही वह पहला शख्स था जिसने भरी सभा में दुर्योधन की ज्यादती का विरोध किया। भीम और अर्जुन जैसे वीरों से भरी सभा में द्रुपद सुता की लाज जब लूटी जा रही थी तब यह महापुरुष कायर से चुप थे। तब केवल विकर्ण ही था जिसने दुर्योधन को ललकारा।--- महासंग्राम में लड़ते हुए भी विकर्ण, तुम नहीं थे महाभारत। गुरु व्यास ने भी कहां दिया तुम्हें उचित स्थान। तुमसे देखा नहीं गया बंदी-सा नीतिशास्त्र का मौन सियासी हरकतों का वह बाना पदलिप्सा में लिप्त अंधा राजा और बहरे सभासद। तुम युवा थे, उबला होगा तुम्हारा लहू, चीखी होगी आत्मा तुम्हारा होना मिटा नहीं सकी लाख कोशिशों के बावजूद गुरुजनों की उपसिथति तुम चीखें और इतिहास में दर्ज हो गए। अब ऐसी भूल मत करना विकर्ण कहां से लाओगे साक्ष्य चश्मदीद गवाह यहां तो हर दीदे पर स्याह शीशे हैं। कैसे हल करोगे यह यक्ष प्रश्न कि घर में घात लगाता शख्स दुशासन ही है। कैसे सिद्ध करोगे भरी सभा में चीखती द्रुपद सुता ही है। गायब हो जाएगा दुशासन या खो जाएगी द्रोपदी कहीं। यह भी हो सकता है कि तुम देखो दुशासन के साथ खिलखिलाती द्रोपदी। तब तुम क्या करोगे विकर्ण अपनी ही आवाज के साथ दबा दिए जाओगे दो फीट गहरे मोक्षदायिनी मिट्टी में तब चाहकर भी कोई व्यास का होना आरक्षित नहीं रख सकेगा तुम्हारे लिए किसी कृति में कोई कोना।।
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