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| Wednesday 20 August, 2008 |
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औरत के नाम

सच कहूंगी तो हार जाऊंगी क्योंकि मैं औरत हूं। जुल्म,बेबसी की अकथ शोहरत हूं क्योंकि मैं औरत हूं। लपलपाती निगाहों से निकली जो बच घर की चौखत पर दामन स्वाहा हो गया। चीख पहुंची न उनके कानों तलक कैसे नाते,बस कागज पर छपी दौलत हूं, क्योंकि मैं औरत हूं।जिस्म हूं, जान हूं, महफिल मैं अधर्य पान हूं बस जिंदा इसी एक बदौलत हूं क्योंकि मैं औरत हूं। बनाकर मुझको संगमरमर खुश है जमाना इस अदा पर रौंदते हैं मेरी छाती, पेट तालू फिर भी चुप जिंदा एक मूरत हूं क्योंकि मैं औरत हूं।
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