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Wednesday 20 August, 2008
By  yogesh jadon   01:24 | 11/May/2008 |  1 Comment(s)
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मायावती का सोशल फार्मूला

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अहम् बरअहम् अम्बेडकर मध्यप्रदेश के ब्राह्मणों मैं एन दिनों अजीब अकुलाहट है। ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकर बड़ी साबित करने की होड़। अकेला ब्रह्मण ही क्यों पुरा सवर्ण वर्ग ही एस दोड मैं सामिल है, ब्रह्मण कुछ ज्यादा। उप मैं जब से मायावती का सोशल फार्मूला हित हुआ है , तमाम प्रदेशों का भाईचारा राजनितिक गदिंत के एस अब्सर को लपक लेने की फिराक मैं है। मप इससे अछुता नही है। मप के कस्बों की दिबरे एन दिनों माया और उनके भाईचारा गन मैं रंगी हुई हैं ।मायावती को सामाजिक सद्भाव का देवदूत बताते यह संदेश स्वरण वर्ग को सत्ता के गलियारे तक पहुँचने के लिए सुनहरे रस्ते नजर आ रहा है। जातिवादी सम्मेलन मैं भीड़ का उन्माद to देखते ही बनता है । पंडितों के बीच रातों रात नए नेता प्रगट हो गए । यह वो लोग थे जो कभी अपने कसबे और शहर मैं छोटी-मोटी राजनीत किया करते हैं । इनके पास पैसे की ताकत है और मायावती उन्हें एक अब्सर दिखाती दे रही है । इन लोगों के बीच आज एक बात नारे की तरह प्रचलित हो रही है । अहम् ब्रह्म अम्बेडकर । सबसे बडा अम्बेडकरवादी होने का दिखावा । सबसे बडा दलित होने की खव्हिश । इनमें से बहुत कम को ही अम्बेडकर और उनके सिधान्तो से कोई लेना देना हो। बहुतेरे तो इस सबसे वास्ता ही नही रखते। उनके लिए अम्बेडकर होने का मतलब है दलितों के साथ उठाना बैठना और उनके हितैषी होने का ढोंग करना। उनके लिए दलित एक वोट बैंक है जो जातीयता के इस उन्मादी युग मैं उनकी जात के सत्ता तक पहुँचने की उनकी क्वाहिश को पूरा कर सकता है। मध्यप्रदेश के जातिगत आंकडो की बात करें तो यहाँ ब्रह्मण के सिथति यूपी से अलग है। प्रदेश की ३०० से अधिक विधानसभा मैं ३० फीसदी भी एसी नही हैं जहाँ ब्रह्मण अकेले अपने दम पर कोई सीट जीता सके। प्रदेश के उत्तर-पछिम इलाके मैं अनुसूचित और पिछड़ा वर्ग की संख्या अधिक है । बसपा इस इलाके मैं अपनी उपस्थिति दर्ग करती आ रही है। उसकी असली पहचान तो जनजातीय छेत्र मैं होनी है । यहाँ अभी तक जनजातीय वर्ग का कांग्रेस से मोह नही टुटा है । इस इलाके मैं ब्रह्मण एस हालत मैं नही है की वः माया के वोट बैंक से मिलकर उसे सत्ता तक पहुँचा सके । इसे मैं मध्यप्रदेश मैं माया अकेले ब्राह्मणों के बूते नही रह सकती हैं । सम्भव है की वः अपना प्रतिनिधि इलाके के बहुसंख्यक वर्ग से ही चुने । यह ब्रह्मण , ठाकुर ,बनिया या फिर कोई भी हो सकता है । यूपी मैं उनहोने इस फार्मूले को अपनाने का मन तभी बना लिया था जब भाजपा ने दूसरी बार उनकी सरकार गिराई थी । माया और उनके साथियों ने तभी सीधे जनता के बीच जाकर गठबंधन करने की बात कही थी। इस अब्सर को वहाँ ब्राह्मणों ने पहले पकड़ा । यूपी के ब्राह्मणों का मध्य प्रदेश मैं सम्बन्ध हैं । रोटी बेटी के सम्बन्ध। सत्ता के इस खेल मैं इन संबंधों के जरिये भी अवसर लपकने की कवायद चल रही है इस मामले मैं मध्यप्रदेश के सामाजिक कार्यकर्त्ता और राजनीत मैं दखल रखने वाले मेरे एक मित्र की टिप्पणी मायने रखती है। जब इस से मायावती के इस जादू के बारे मैं पूछा टू उसका कहना था की प्रदेश मैं इन दिनों सभी पंडितो मी ख़ुद को सबसे बड़ा दलित साबित करने की होड़ लगी हुई है । जब की मेरे मित्र का कहना था की मायाबती की पार्टी को मप मैं यूपी सी सफलता नही मिलने वाली है । वह इसके कारण भी गिनता है । पहला तो यह की यूपी का ब्रह्मण ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा था । उसे न तो बीजेपी मैं जमीन दिख रही थी और न ही यादवों के बीच सम्मान । उन्हें ये सम्मान दलितों मैं दिखाई दिया । मप के ब्राह्मणों के सामने इस तरह के हालत नही हैं । यहाँ जातीय उन्माद की हालत भी वैसी नही है। तीसरे प्रदेश का वोटर अभी दो पार्टियों से इतर विकल्प की तलाश मैं नही है । मायावती के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भले ही उन्हें मप की सत्ता न दिला पाई लेकिन इतना तय है की उसने इस प्रदेश की उच्च जाती के मुंच और पूँछ के बल खोल दिए हैं । जातिवाद के उन्मादी अब बेशर्म तरीके से ही ख़ुद को बडा कह सकते हैं । माया के जातिवादी राजनेतिक घोल ने वो कर दिखाया है जो कभी अम्बेडकर और बुध नही कर सके । सत्ता की सस्ती डगर पर चलने को आतुर सवर्ण जाती के दिग्गजों के बीच आज ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकरवादी साबित करने की होड़ लगी हुई है । यह सामाजिक बदलाव है । कल तक जिसे अचुत मन आज उसकी बराबरी करने की आतुरता। यह सत्ता का जादू हो सकता है लेकिन इस जादू ने जातीय दर्प की सच्चाई की पोल तो खोल ही दी है।

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