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| Wednesday 20 August, 2008 |
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हर बार हारा हूं मैं

बार-बार जी करता है कि लिख ही दूं सब कुछ सच-सच कि अंतडियां कंपकंपा देने वाली ठंड में सीलन भरी कोठरी के तमाम कोनों में सोने का कानून तलशता मैं सुबह को तपासता हूं उंगलियों से और पोरों से टकराता है उदास और भुरकुस अंधेरा। ढूंढता है बदन परिचित झुरझुरी में तुम्हें और तुम पड़ोस की फुसफुसाहटी गरमी में खो जाती हो जैसे चली जाती है सरदी में ढांढस देती बिजली। कितनी बार चाहा कि जान ही लो तुम पेट-औ-पीठ को जोड़ती नौकरी दम तोड़ देती है हर शाम हुक्मरानों के जूतों तले दबकर। आखिर किसको पुकारू यहां, सब सोए हैं निरे अंधेरे में हाथ-पैर पटकते, अपने आप में ही मुग्ध। थके बदन चुचआते पसीने के बीच जब भी बैठता हूं थोपने रोटियां तब सोचता हूं कल लिख ही दूंगा। हर बार बदल जाता है मन कि कही यह सब पढ़कर तुम्हारा संकुचन स्थायी न हो जाए। और तपेदिक हालात पढ़कर तुममे विगलन न हो जाए क्योंकि वह दीया जहां से जरुरी ऊष्मा आ रही है वह तुम्हीं में तो जल रहा है।
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