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| Wednesday 20 August, 2008 |
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एक विनम्र पड़ताल

मुझे इस बात से, कुछ नहीं लेना कि आप दिखने में कैसे हैं जवान हैं या बूढ़े। मुझे इससे भी कोई मतलब नहीं कि, आपके घर बिछे कालीन का रंग कैसा है। आपके शयनकभ से झांकती चादर कितनी मैली हो गई है। मुझे इससे भी कोई सरोकार नहीं कि, आपके कीमती पैन में, भरी स्याही की, कीमत किसने चुकाई है। आप क्या पढ़ते हैं, कितना पढ़ते हैं, इससे भी मेरा खास संबंध नहीं है। मुझे पूछना है अब अपनी लेखनी से जिंदगी पर छाए कुहासे को क्या वह छांट सकती है दूर तक फैले तीरगी को चीरने का हौसला है। मैं जांचना चाहता हूं उन हाथों को, थाम रखी हैं जिनमें कलम शिराओं में बहते लहू में अब कितनी तपिश है।
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