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| Wednesday 20 August, 2008 |
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कुछ शहरों का किक्रेट
 आपीएल का तमाशा कुछ शहरों का किक्रेट बनकर रह गया है। दरअसल इस खेल में अब पहले का जुनून नहीं पा रहा है। हमारे देश में किक्रेट हमेशा से ही भावना का खेल रहा है। खुद को बेहतर करने की भावना। ऐसे में जब वह किक्रेट के करीब होता है तो खुद को एक हिंदुस्तानी के रुप में ही देखता है। उसकी इच्छा पूरे विश्व पर छाने की होती है। इसे आप दमित भावनाओं की प्रतिक्रिया भी कह सकते हैं। मगर वह जो जुनून पाकिस्तान या किसी अन्य देश के साथ अपने देश टीम के साथ होने वाले मैचों में पाता है वह आईपीएल में नहीं है। आइपीएल के काले गोरों से भरी टीम में वह खुद को किससे जोड़े यही तय नहीं कर पाता है। ऐसे में यह खेल उन शहरों तक ही सिमट गया है जहां कि टीम इस मैच में भाग ले रही हैं। कई की हालत तो यह है कि उन्हें पता ही नहीं कि कौन खिलाड़ी किसके साथ है। फिर गोरों की कलाई मरोड़ते या फिर पाकिस्तान की हिप-हिप हुर्रे वह कहां से ढूंढे। उसके लिए तो खिलाड़ी मैदान में खेलता योद्धा है। अब गोरों और कालों की विविधता की इस टीम में वह अपना योद्धा कहां से खोजे।
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