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Wednesday 20 August, 2008
By  yogesh jadon   14:38 | 25/Apr/2008 |  0 Comment(s)
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महासंग्राम में

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यह कविता महाभारत के एक पात्र विकर्ण पर लिखी है। महाभारत में अद्भूत पात्र है विकर्ण। एक ऐसा पात्र जो नायकों की भीड़ में खो सा गया। व्यास भी इस पात्र के साथ न्याय से करते नहीं दिखते। जबकि विकर्ण ही वह पहला शख्स था जिसने भरी सभा में दुर्योधन की ज्यादती का विरोध किया। भीम और अर्जुन जैसे वीरों से भरी सभा में द्रुपद सुता की लाज जब लूटी जा रही थी तब यह महापुरुष कायर से चुप थे। तब केवल विकर्ण ही था जिसने दुर्योधन को ललकारा।---
महासंग्राम में लड़ते हुए भी
विकर्ण, तुम नहीं थे महाभारत।
गुरु व्यास ने भी कहां दिया
तुम्हें उचित स्थान।
तुमसे देखा नहीं गया
बंदी-सा नीतिशास्त्र का मौन
सियासी हरकतों का वह बाना
पदलिप्सा में लिप्त अंधा राजा
और बहरे सभासद।
तुम युवा थे, उबला होगा
तुम्हारा लहू, चीखी होगी आत्मा
तुम्हारा होना मिटा नहीं सकी
लाख कोशिशों के बावजूद
गुरुजनों की उपसिथति
तुम चीखें और इतिहास
में दर्ज हो गए।
अब ऐसी भूल मत करना विकर्ण
कहां से लाओगे साक्ष्य
चश्मदीद गवाह
यहां तो हर दीदे पर
स्याह शीशे हैं।
कैसे हल करोगे यह
यक्ष प्रश्न कि
घर में घात लगाता
शख्स दुशासन ही है।
कैसे सिद्ध करोगे
भरी सभा में चीखती द्रुपद सुता ही है।

गायब हो जाएगा दुशासन
या खो जाएगी द्रोपदी कहीं।
यह भी हो सकता है
कि तुम देखो
दुशासन के साथ खिलखिलाती द्रोपदी।

तब तुम क्या करोगे विकर्ण
अपनी ही आवाज के साथ दबा दिए जाओगे
दो फीट गहरे
मोक्षदायिनी मिट्टी में
तब चाहकर भी कोई व्यास का होना
आरक्षित नहीं रख सकेगा
तुम्हारे लिए किसी कृति में कोई कोना।।
 

Category: Poetry | Permalink