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| Wednesday 20 August, 2008 |
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भोलाराम

गांधी बप्पा का चरखा है जीवन बना कपास रस निचोड़ती संसद है भोलाराम उदास। सूनी आंखों बीच बसे कब लौटेंगे दिन अच्छे लोकतंत्र की खाल खींचते डाकू चोर उचक्के। सातों पहरे है राम सुमिरता भोलाराम मनाता खैर फसल बीन ले गई सोन चिरैया मुझ गरीब से कैसा बैर।। वोटों के फसली मौसम में आएंगे पद वंदनहार पांच साल के कष्ट भूलाने तन ऊपर देंगे कंबल डाल सात पीढ़ियां गुजर गईं घिसती एड़ी करते काम बड़े भाग्य युवराज पधारे मुएं वोट का क्या है दाम छाती ताने गदगद फिरता सोचे वोटर भोलाराम।।
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